Tata Sons में बड़ा बोर्डरूम विवाद, नेतृत्व और IPO को लेकर बढ़ी खींचतान
मुंबई। भारत के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल Tata Group की होल्डिंग कंपनी Tata Sons इस समय नेतृत्व और कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर बड़े विवाद के दौर से गुजर रही है। कंपनी के बोर्ड में हालिया बैठक के दौरान चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन के कार्यकाल और Tata Sons के संभावित IPO को लेकर मतभेद सामने आए हैं।
विवाद उस समय और बढ़ गया जब Tata Sons के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को पांच साल का एक और कार्यकाल देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी, जबकि Tata Trusts के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का विरोध किया।
चंद्रशेखरन को मिला नया कार्यकाल
Tata Sons के बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन को Executive Chairman के पद पर पांच साल के लिए फिर से नियुक्त करने का फैसला किया है। उनका मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में समाप्त होना था।
चंद्रशेखरन ने इससे पहले अगस्त में संकेत दिया था कि वह अपना कार्यकाल आगे बढ़ाने के इच्छुक नहीं हैं। इसके बाद कंपनी की Nomination and Remuneration Committee ने उनसे अपना फैसला बदलने का अनुरोध किया। सितंबर में हुई बोर्ड बैठक में उनके पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव को बहुमत से मंजूरी दे दी गई।
हालांकि, इस प्रस्ताव पर नोएल टाटा ने विरोध दर्ज कराया। इससे Tata Sons के भीतर बोर्ड की भूमिका और Tata Trusts के अधिकारों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
Tata Trusts की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
Tata Trusts का Tata Sons में लगभग दो-तिहाई हिस्सा है। इसी वजह से ट्रस्ट्स की भूमिका कंपनी के महत्वपूर्ण फैसलों में बेहद प्रभावशाली मानी जाती है।
मौजूदा विवाद सिर्फ चंद्रशेखरन के कार्यकाल तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल भी है कि Tata Sons के Articles of Association के तहत बोर्ड और Tata Trusts के अधिकारों की सीमा क्या है।
यदि इस मामले को कानूनी चुनौती दी जाती है, तो Tata Sons की कॉरपोरेट गवर्नेंस व्यवस्था पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है।
Tata Sons IPO भी बना विवाद का बड़ा मुद्दा
नेतृत्व विवाद के साथ-साथ Tata Sons के संभावित IPO ने भी स्थिति को महत्वपूर्ण बना दिया है।
Tata Sons ने पहले अपने NBFC रजिस्ट्रेशन से बाहर निकलने की कोशिश की थी। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने कंपनी की इस कोशिश को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद Tata Sons पर लागू नियामकीय और संभावित लिस्टिंग आवश्यकताओं का मुद्दा फिर सामने आ गया है।
बोर्ड ने अब RBI के नियमों का पालन करने और इस मामले में आगे की प्रक्रिया पर काम करने की दिशा में कदम उठाए हैं।
यदि Tata Sons शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती है, तो यह भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण लिस्टिंग में से एक हो सकती है।
IPO से बदल सकता है Tata Group का ढांचा
Tata Sons, पूरे Tata Group की शीर्ष होल्डिंग कंपनी है। इसके जरिए समूह की कई प्रमुख कंपनियों में हिस्सेदारी जुड़ी हुई है, जिनमें TCS, Tata Motors, Air India और Jaguar Land Rover जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं।
Tata Sons के सार्वजनिक होने से कंपनी के शेयरों की बाजार में ट्रेडिंग संभव होगी और बाहरी निवेशकों की भूमिका बढ़ सकती है। इससे Tata Sons और Tata Trusts के बीच पारंपरिक नियंत्रण संरचना में भी बदलाव आ सकता है।
इसके अलावा, Tata Sons में अल्पांश हिस्सेदारी रखने वाले Shapoorji Pallonji Group के लिए भी IPO महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि लिस्टिंग से उसकी हिस्सेदारी को बाजार में अधिक तरलता मिल सकती है।
फिर याद आया Cyrus Mistry विवाद
Tata Sons में मौजूदा टकराव ने 2016 के Cyrus Mistry विवाद की याद भी ताजा कर दी है। उस समय मिस्त्री को Tata Sons के चेयरमैन पद से हटाए जाने के बाद Tata Group में लंबा कॉरपोरेट और कानूनी विवाद चला था।
हालांकि मौजूदा घटनाक्रम उस विवाद से अलग है, लेकिन दोनों मामलों में बोर्ड की शक्तियों, Tata Trusts के प्रभाव और Tata Sons की गवर्नेंस व्यवस्था जैसे मुद्दे चर्चा में रहे हैं।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर Tata Sons की अगली शेयरधारक बैठक और RBI से जुड़ी प्रक्रिया पर है। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर Tata Trusts आगे क्या कदम उठाते हैं।
यदि इस फैसले को कानूनी चुनौती दी जाती है, तो विवाद आगे अदालत तक भी पहुंच सकता है। दूसरी ओर, Tata Sons को IPO और RBI के नियामकीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर भी आगे की रणनीति तय करनी होगी।
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Tata Sons भारत के सबसे प्रभावशाली कारोबारी समूहों में से एक की शीर्ष होल्डिंग कंपनी है। इसलिए मौजूदा बोर्डरूम विवाद का असर केवल एक पद या एक बोर्ड बैठक तक सीमित नहीं माना जा रहा है। आने वाले महीनों में नेतृत्व, गवर्नेंस और संभावित IPO को लेकर लिए जाने वाले फैसले Tata Group की भविष्य की संरचना के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।